हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
बायाँ कोना
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

रेखा को अपने पहले टूर्नामेंट से पहले जीतने की नहीं, हाथ मिलाने की चिंता थी। सामने वाली खिलाड़ी उससे छोटी हुई तो क्या वह नमस्ते करेगी? बड़ी हुई तो? भतीजी मिताली ने समझाया था, “मौसी, हाथ आगे बढ़ाना। आशीर्वाद लेने मत झुक जाना।”
बयालीस की उम्र में रेखा ने दफ़्तर के तहख़ाने में रखी टेबल पर खेलना शुरू किया था। आठ महीने बाद वह कस्बे की खुली महिला प्रतियोगिता के सेमीफ़ाइनल में थी। उसके रैकेट की रबर के एक कोने पर अभी भी पुराने मालिक का नाम, ‘मनोज’, दिखता था।
उधर उर्मिला सक्सेना ने अपना रैकेट निकाला तो कवर में कपूर की गोलियाँ खनकीं। बाल सफ़ेद थे। दायाँ घुटना पट्टी में था।
“पहली बार?” उन्होंने पूछा।
रेखा ने सिर हिलाया।
“अच्छा। मेरी तीसवीं बार है। इससे ज़्यादा कुछ मत समझना।”
पहला गेम रेखा ने आसानी से जीत लिया। उर्मिला छोटी सर्विस उठाने में देर करतीं, फिर हथेली घुटने पर रख लेतीं। दूसरे गेम में उन्होंने गेंद बार-बार रेखा की कोहनी की तरफ़ भेजी। रेखा तय ही नहीं कर पाई कि फ़ोरहैंड लगाए या बैकहैंड। वह गेम चला गया।
निर्णायक गेम में मिताली ने दर्शकों की बेंच से अपनी बाईं तरफ़ इशारा किया। उर्मिला उधर पहुँच नहीं पा रही थीं।
रेखा ने वही किया। दस-आठ। जीत से एक अंक दूर।
अगली गेंद ऊँची उठी। टेबल का बायाँ कोना खाली था। उर्मिला की साँस की आवाज़ रेखा तक आ रही थी।
उसने गेंद धीरे से बीच में लौटा दी।
उर्मिला ने बिना जगह बदले उसे इतनी तेज़ मारा कि गेंद रेखा के पीछे दीवार से टकराई।
दस-नौ।
“मार क्यों नहीं दिया?” उर्मिला ने पूछा।
“आपका घुटना...”
उर्मिला ने गेंद हथेली में रख ली।
“तुम्हें मैच खेलना है या मुझे बस में सीट देनी है?”
पास बैठे स्कोर लिखने वाले लड़के की हँसी छूट गई। रेखा का चेहरा गरम हो गया।
अगली सर्विस वह पढ़ नहीं पाई। फिर एक लंबी रैली में उसकी गेंद बाहर गई। आख़िरी अंक पर उसने पूरे ज़ोर से खाली कोने में मारा। उर्मिला पहुँचीं, किसी तरह रैकेट लगाया, और गेंद जाल छूकर रेखा की तरफ़ गिर गई।
बारह-दस। मैच ख़त्म।
रेखा ने हाथ बढ़ाया। उर्मिला ने कसकर पकड़ा।
बाहर मिताली ने कहा, “तुमने एक अंक दान कर दिया।”
“हाँ।”
“वरना जीत सकती थीं।”
रेखा ने जवाब नहीं दिया। वह वापस हॉल में गई। उर्मिला जूते बदल रही थीं।
“आप कहाँ अभ्यास करती हैं?”
“डाकघर वाले हॉल में। बुधवार, छह बजे।”
“मैं आ सकती हूँ?”
“आओ। गेंदें बटोरनी पड़ेंगी।”
अगले बुधवार रेखा पाँच मिनट पहले पहुँची। उर्मिला की पट्टी देखकर उसने बैग से अपना रैकेट निकाला, गेंद दो बार उछाली और पहली सर्विस उनके बाएँ कोने में की।
कहानी के पीछे का खयाल
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