हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
एक चिट्ठी अपने नाम
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

नौकरी के आखिरी दिन हरिराम ने साइकिल की घंटी तीन बार बजाई। पहली बार हमेशा की तरह, दूसरी बार आदत से और तीसरी बार इसलिए कि कल यह साइकिल किसी और के हिस्से आनी थी।
थैले में सात चिट्ठियाँ थीं। छह के पते साफ थे। सातवें लिफाफे पर लिखा था:
“उस आदमी के लिए, जो पीली कोठी के बाहर चिट्ठी पढ़ता था।”
न मोहल्ला, न नाम।
नए डाकिए दीपक ने लिफाफा उलटकर देखा।
“वापस भेजना पड़ेगा।”
हरिराम ने टिकट के ऊपर लगी मुहर देखी। शहर का नाम पहचान में आया। वहीं तो शांति की बेटी गई थी।
पीली कोठी अब नीली थी। उसके सामने सब्जियों की छोटी दुकान पर कभी शांति बैठती थी। बेटी की चिट्ठी आने पर वह हाथ पोंछती, बोरी उलटकर हरिराम को बैठाती और कहती, “पहले पूरी पढ़ना। बीच में सवाल नहीं पूछूँगी।”
फिर पहली पंक्ति पर ही पूछ लेती।
बेटी की शादी, पहला बच्चा, नई नौकरी। हरिराम ने सब उसी बोरी पर बैठकर पढ़ा था।
दो साल पहले शांति दुकान बेचकर चली गई। हरिराम को बस इतना पता था कि अब वह बेटी के पास रहती है।
उन्होंने लिफाफा जेब में रखा, मगर खोला नहीं।
दोपहर में पुराने दुकान-मालिक से बेटी का फोन नंबर मिला। तीन कोशिशों के बाद बात हुई।
“चिट्ठी आपने भेजी है?” उन्होंने पूछा।
“अम्मा ने। आपको ही भेजी है। अपना नाम लिखना याद रहा, आपका पूछना भूल गईं।”
हरिराम चुप रहे। इतने वर्षों में शांति ने उन्हें सिर्फ “डाक बाबू” कहा था।
अब उन्होंने लिफाफा खोला।
अंदर कॉपी से फाड़ा हुआ पन्ना था। पेंसिल के हल्के निशानों के ऊपर नीली स्याही चली थी।
“डाक बाबू, मैं स्कूल जाती हूँ। शाम वाला। अपना नाम लिख लेती हूँ। बेटी का भी। यह चिट्ठी मैंने लिखी है। किसी ने मेरी तरफ से नहीं लिखी।”
अगली पंक्ति काटी गई थी। उसके नीचे लिखा था:
“आपका नाम नहीं जानती। इस बार जवाब में लिख देना।”
हरिराम ने पन्ना फिर पढ़ा। फिर फोन पर पूछा, “शांति जी हैं?”
“कक्षा में गई हैं।”
डाकघर लौटे तो विदाई की चाय ठंडी हो चुकी थी। मेज पर माला और मिठाई का डिब्बा रखा था। दीपक ने पूछा, “अधूरे पते वाली चिट्ठी का क्या हुआ?”
“पता मिल गया।”
हरिराम ने एक अंतर्देशीय पत्र खरीदा। लिखने बैठे तो काफी देर तक पहली पंक्ति नहीं बनी। रोज इतने पते देखने वाले हाथ को अपने बारे में कहाँ से शुरू करना चाहिए?
आखिर लिखा:
“शांति जी, मेरा नाम हरिराम है। आज मैं नौकरी से छुट्टी पा गया। कल से मेरे पास बहुत समय होगा।”
थोड़ा सोचकर उन्होंने जोड़ा:
“आपकी अगली चिट्ठी का इंतजार रहेगा।”
नीचे अपने घर का पूरा पता उन्होंने बहुत साफ अक्षरों में लिखा।
कहानी के पीछे का खयाल
कहानी का खयाल एक ऐसे डाकिए से शुरू होता है जो दूसरों की चिट्ठियाँ पहुँचाता रहा, लेकिन अपनी बात कभी लिख नहीं पाया।
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