हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
बारह नंबर कमरे की चाबी
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

होटल बेचने से एक दिन पहले रितु को बारह नंबर कमरे की चाबी मिली। वह रिसेप्शन की मेज के नीचे गिरी हुई थी। चाबी के साथ सफेद गत्ते का छोटा टुकड़ा बँधा था। उस पर नीली स्याही से 12 लिखा था। रितु ने उसे चाबियों के बोर्ड पर टाँगना चाहा, लेकिन बारह नंबर का कोई हुक नहीं था।
“ऊपर का कमरा है,” बंसी काका ने कहा। वे चालीस साल से होटल सँभाल रहे थे। “उसकी चाबी कहाँ से मिली?”
रितु ने मेज की तरफ इशारा किया। काका झुके, जैसे नीचे कुछ और ढूँढ़ रहे हों। फिर बोले, “अब वहाँ कुछ नहीं रखा।”
चाचा के गुजरने के बाद होटल रितु के नाम हुआ था। वह सामान की लिस्ट बनाने आई थी। अगले दिन सब नए मालिक को देना था।
ऊपर बारह नंबर के दरवाजे पर धूल जमी थी। चाबी ताले में गई, पर घूमी नहीं। रितु ने जोर नहीं लगाया। नीचे लौटकर पूछा तो काका बोले, “पुराना ताला है। अटकता होगा।” फिर उन्होंने उससे चाबी माँगी।
“पहले सामान की लिस्ट बना लूँ,” रितु ने कहा। “कल कोई चीज रह गई तो मुझे ही जवाब देना होगा।”
काका चुप हो गए। वे सुबह से एक ही कप में तीन बार चीनी डाल चुके थे।
पुराने रजिस्टर में बारह नंबर कमरा मिल गया। पूरे पन्ने पर दूसरे कमरों के आगे नाम थे, तारीखें थीं, किराया था। बारह के आगे हर जगह एक छोटी-सी लाइन थी। जैसे वहाँ कभी कोई रुका ही नहीं।
रितु ने आखिरी रजिस्टर खोला। इक्कीस नंबर के आगे एक ही नाम बार-बार लिखा था: एस. कुमार। अलग तारीखें, वही नाम। रितु ने काका को बुलाया।
“ये हर साल आते थे?”
“कभी-कभी।”
“पूरा नाम नहीं लिखते थे?”
“जैसा बताया, वैसा लिखा।”
चाचा हर छोटी चीज साफ लिखते थे। किसी मेहमान का आधा नाम छोड़ देना उनके जैसा नहीं लगा।
अगले पन्ने के बीच एक फोटो थी। होटल के बाहर पाँच लोग खड़े थे। बाकी चेहरे वह नहीं पहचानती थी, लेकिन बीच में उसके पापा थे—बहुत जवान, एक हाथ में छोटा सूटकेस और दूसरे में कागजों का बंडल। पीछे बोर्ड पर वही होटल का नाम लिखा था।
पापा ने कभी नहीं बताया था कि वे यहाँ आए हैं। वे तो कहते थे कि पहाड़ों में बस एक बार गए थे, स्कूल के साथ। फोटो के पीछे 1989 लिखा था। उस समय वे स्कूल में नहीं थे।
रितु ने पापा को फोन लगाया। “आप चाचा के होटल में रुके थे?” दूसरी तरफ टीवी की आवाज बंद हुई।
“तुम्हें किसने बताया?”
“फोटो मिली है।”
पापा ने थोड़ी देर बाद कहा, “पुरानी बात है। बंसी को फोन देना।”
रितु ने फोन नहीं दिया। “एस. कुमार आप हैं?”
“मेरा नाम सुरेश है, ये तो जानती हो।”
“पूरा नाम नहीं लिखा, इसलिए पूछ रही हूँ।”
इस बार पापा ने बस इतना कहा, “वो कमरा मत खुलवाना। उसमें कुछ काम का नहीं है।” फिर लाइन कट गई।
रितु ने फोटो मेज पर रखी। बंसी काका अब तक खड़े थे। “बारह की चाबी पापा के कमरे की है?” उसने पूछा। काका ने सिर हिलाया। “वहाँ बारह नंबर कमरा कभी था ही नहीं। वो बाद में छोटा स्टोर बना। नंबर तो ऐसे ही लगा दिया था।”
रितु ने चाबी का गत्ता घुमाया। अंक सीधी लकीरों में लिखे थे, जैसे डिजिटल घड़ी पर होते हैं। उलटते ही 12 का 21 बन गया। नीचे की पहचान वाली लाइन घिस चुकी थी।
इक्कीस नंबर का ताला खुल गया। अंदर मेज, दो कुर्सियाँ और दीवार से टिके बड़े-बड़े कागज थे। पहले कागज पर होटल की बालकनी बनी थी। नीचे लिखा था: सुरेश, 1989।
हर कागज पर पापा का नाम था। किसी में बंसी काका चाय लेकर सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे। किसी में खिड़की के पास बैठी चाची थीं। आखिरी तस्वीर अधूरी थी—रिसेप्शन के पीछे खड़े चाचा, जिनका चेहरा अभी बनना बाकी था।
“वो पेंटिंग करते थे?” रितु ने पूछा। घर में पापा के हाथ में उसने हमेशा दुकान का हिसाब देखा था। रंगों का डिब्बा कभी नहीं।
काका ने मेज की दराज खोली। अंदर पापा की चिट्ठी थी। उन्होंने लिखा था कि घर लौटकर नौकरी करेंगे, तस्वीरें लेने बाद में आएँगे। होटल खुलता-बंद होता रहा। पापा नहीं आए। चाचा ने कमरा वैसे ही रहने दिया।
“फिर रजिस्टर में हर साल नाम क्यों?”
“आपके चाचा लिखते थे। कहते थे, सुरेश का सामान है तो कमरा उसी का है। मैं मना करता था। फिर सोचा, कौन देखने आएगा।” काका ने रजिस्टर से निकली फोटो सीधी की। “अब सब दे देना था। समझ नहीं आया कैसे बताऊँ।”
रितु ने पापा को दोबारा फोन किया। इस बार वीडियो कॉल थी। उसने कैमरा अधूरी तस्वीर के सामने किया। पापा बोले नहीं। काफी देर बाद उन्होंने पूछा, “रंग सूख गए होंगे?”
“हाँ। नए लेने पड़ेंगे।”
“तुम्हारे चाचा बहुत दुबले थे उस समय।”
“मुझे नहीं पता। आप बताओगे तो चेहरा बन जाएगा।”
शाम तक पापा होटल पहुँच गए। रितु ने सारे कागज पैक नहीं किए थे। अधूरी तस्वीर मेज पर रखी थी। पापा ने पहले बंसी काका से चाय माँगी। फिर पूछा कि पास में रंग कहाँ मिलेंगे।
अगली सुबह सामान की लिस्ट में रितु ने लिखा: इक्कीस नंबर कमरा—खाली। पापा की तस्वीरें कार में थीं। रिसेप्शन पर एक नई तस्वीर सूख रही थी। उसमें चाचा का चेहरा पूरा था।
जाने से पहले रितु ने चाबी का गत्ता बदला। साफ-साफ 21 लिखा और नीचे एक लाइन खींच दी। बंसी काका ने देखकर कहा, “अब कोई गलत कमरे में नहीं जाएगा।”
कहानी के पीछे का खयाल
गलत पढ़ा गया नंबर इस रहस्य की शुरुआत है। कमरे में किसी अपराध के बजाय पिता का छोड़ा हुआ शौक और परिवार की अनकही बात मिलती है।
मेरी पसंद की कहानियाँ (0)
इसी browser में सेव हैं। Browser का डेटा साफ करने पर हट जाएँगी।
अभी कोई कहानी सेव नहीं है। कहानी खोलकर सेव करें।