हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
दराज़ के पीछे
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सुरेश बाबू ने शालिनी को अलमारी का ताला बदलने बुलाया था। पहुँचते ही बोले, “मजबूत लगाना। खर्च की चिंता नहीं है।”
शालिनी ने औज़ारों का बक्सा नीचे रखा। “पहले पुराना देख लूँ।”
ऊपर की दराज़ में पेंशन के कागज़ थे। नीचे वाली खाली थी। उसके नीचे वाले खाने में धूल जमी थी। सुरेश बाबू ने उसे भी खाली करके देख लिया था।
“यहीं दस हज़ार रुपये रखे थे। लिफाफे में। कल सुबह।”
“दराज़ बंद थी?”
“ताला लगा था। चाबी ऊपर की कटोरी में रहती है।”
फिर उन्होंने बरामदे की तरफ देखा। किराएदार फ़रहान वहाँ अपना मोबाइल खोलकर बैठा था। उसके पास कमरे की दूसरी चाबी रहती थी, क्योंकि बिजली का मीटर इसी कमरे में था।
“उससे पूछ लिया?” शालिनी ने कहा।
“कहता है हाथ भी नहीं लगाया।”
शालिनी ने दराज़ खींची। आधी दूरी पर वह अटकी, फिर झटके से बाहर आई। पीछे की कील में नीले कागज़ का एक रेशा अटका था।
“लिफाफा नीला था?”
सुरेश बाबू सीधे खड़े हो गए।
उसने दराज़ का तल दबाया। पिछली तरफ कील निकल आई थी। लकड़ी नीचे झुकती थी और छोड़ने पर वापस उठ जाती थी। शालिनी ने अपना बिल उस जगह रखा और दराज़ बंद की। खोलने पर बिल गायब था।
अलमारी की पिछली पट्टी हटाते ही पहले बिल गिरा, फिर नीला लिफाफा।
पैसे पूरे थे।
सुरेश बाबू ने उन्हें दो बार गिना। तीसरी बार अंगूठा नोटों के किनारे पर रुका रहा।
“दराज़ और पिछली पट्टी के बीच जगह है,” शालिनी ने कहा। “लिफाफा वहीं फँसा था। ताला ठीक है।”
बरामदे में फ़रहान अपना सामान समेट रहा था। उसके पास एक छोटा सूटकेस भी आ गया था, जो पहले नहीं था।
“कहीं जा रहे हो?” सुरेश बाबू ने पूछा।
“शाम तक दूसरा कमरा देख लूँगा।”
सुरेश बाबू ने लिफाफा दिखाया, फिर हाथ नीचे कर लिया।
“पैसे मिल गए। मैंने बिना वजह तुम पर इल्ज़ाम लगाया।”
फ़रहान ने सूटकेस बंद कर दिया। जवाब नहीं दिया।
शालिनी ने ढीली कील निकालकर दो पेंच लगाए। अपने औज़ार समेटकर वह बाहर चली गई।
फ़रहान ने कमरे की चाबी तिपाई पर रख दी और सूटकेस उठा लिया। सुरेश बाबू दरवाज़े से हट गए।
कहानी के पीछे का खयाल
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