हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
दो सौ कुर्सियाँ
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

शादी में मेहमान दो सौ बीस थे और कुर्सियाँ दो सौ।
वीना ने गिनती दूसरी बार की। कुर्सियाँ फिर भी दो सौ ही निकलीं।
“बीस रास्ते में हैं,” टेंटवाले ने कहा।
“किस रास्ते में?”
“लड़का लेकर निकला है।”
उसके पीछे खड़ा लड़का चाय पी रहा था।
वीना ने उसे देखा। उसने कप नीचे रख दिया।
उधर खाने का ऐलान हो चुका था। बुज़ुर्ग बैठ गए थे। बाकी लोग प्लेटें लेकर ऐसी कुर्सियों के पास खड़े थे जिन पर किसी का पर्स, शॉल या छोटा बच्चा रखा था।
“ये मेरी बहन के लिए है।”
“वो कहाँ हैं?”
“आ रही हैं।”
वीना को अचानक लगा कि इस शादी में आधे लोग आ रहे हैं और आधे सामान रखकर जा चुके हैं।
तभी फ़ोटोग्राफ़र दीपक ने उसके पास आकर कहा, “दुल्हन की सारी मौसियों को स्टेज पर बुलवा दीजिए।”
“सिर्फ़ मौसियाँ?”
“फिर मामियाँ।”
वीना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अभी दोनों बुलाओ। उनके पति भी।”
माइक से घोषणा हुई। अट्ठाईस लोग उठे। वीना ने वेटरों को इशारा किया। खाली कुर्सियों पर तुरंत प्लेटें सँभाले मेहमान बैठा दिए गए।
दीपक ने तस्वीर ली। पीछे खड़े एक मामा का चेहरा फूलों में छिप गया।
“एक और।”
वीना ने राहत की साँस ली।
फिर दूल्हे के चाचा-ताऊ बुलाए गए। उसके बाद कॉलेज के दोस्त। फिर पड़ोसी।
हर तस्वीर के साथ खाने की एक नई पारी बैठ रही थी। दीपक को योजना समझ आ गई। अब वह तस्वीर लेने से पहले चश्मे साफ़ करवाता, लंबे लोगों को पीछे करता, छोटे बच्चों को मनाता।
आख़िर दुल्हन ने उसे पास बुलाया।
“मेरी शादी है या परिवार की जनगणना?”
दीपक ने नीचे वीना की ओर देखा। वह पहली बार बैठकर पानी पी रही थी।
“बस एक आख़िरी तस्वीर।”
“किसकी?”
“जो लोग अब तक किसी तस्वीर में नहीं आए।”
स्टेज फिर भर गया।
रात को टेंटवाले ने हिसाब बढ़ाया तो वीना ने बीस कुर्सियों का पैसा काट दिया।
“उनका इंतज़ाम तो हो गया था,” उसने धीरे से कहा।
“हाँ,” वीना बोली। “मगर तुमने नहीं किया था।”
बगल में दीपक अपनी रसीद बना रहा था। उसने मुस्कराकर कैमरा बैग बंद किया।
अगली सुबह उसने तस्वीरों का पहला फ़ोल्डर भेजा।
नाम था: पहली पंगत।
कहानी के पीछे का खयाल
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