हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
शर्मा जी का AI असिस्टेंट
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

शर्मा जी ने नया फोन खरीदते ही पहला सवाल पूछा, “मेरी जिंदगी आसान कर सकते हो?” फोन बोला, “ज़रूर। आपको किस काम में मदद चाहिए?” शर्मा जी खुश हो गए। घर में इतने प्यार से जवाब आखिरी बार तब मिला था, जब उन्होंने पूछा था कि आज खाने में क्या बनाऊँ।
समस्या शनिवार की सोसायटी मीटिंग थी। शर्मा जी सेक्रेटरी थे। हर महीने लोग आते, पार्किंग पर लड़ते, समोसे खाते और अगली मीटिंग की तारीख तय करके चले जाते। इस बार उन्होंने तय किया कि तैयारी फोन करेगा।
उन्होंने असिस्टेंट से कहा, “ऐसा मैसेज बनाओ कि सब समय पर आ जाएँ। थोड़ा जोरदार होना चाहिए।” फोन ने लिखा: शनिवार शाम पाँच बजे जरूरी बैठक। सभी की मौजूदगी ज़रूरी। बड़े बदलावों पर फैसला होगा।
“बड़े बदलाव क्या?” पत्नी ने पूछा।
“पानी की टंकी साफ करवानी है।”
“तो वही लिख दो।”
शर्मा जी ने हाथ हिलाया। “तुम समझती नहीं। प्रोफेशनल भाषा है।” उन्होंने मैसेज ग्रुप में भेज दिया।
दस मिनट बाद गुप्ता जी का फोन आया। “बिल्डिंग बेच रहे हो?” फिर नीचे वाली आंटी ने पूछा कि क्या लिफ्ट हटाकर सीढ़ियाँ बन रही हैं। चौथी मंजिल से किसी ने लिख दिया: मेरी बालकनी पर फैसला करने का किसी को हक नहीं है।
शर्मा जी ने असिस्टेंट से कहा, “सबका डर दूर करने वाला जवाब लिखो।” जवाब आया: चिंता न करें। आपके हितों की पूरी रक्षा होगी। हर फैसला सामूहिक सहमति से लिया जाएगा।
यह पढ़कर किरायेदारों ने अलग ग्रुप बना लिया।
शनिवार को शर्मा जी जल्दी उठे। उन्होंने फोन से पूछा, “मीटिंग के लिए क्या-क्या चाहिए?” फोन ने सूची दी: बैठने की व्यवस्था, पानी, चर्चा के मुद्दे, नोट्स और हल्का नाश्ता। शर्मा जी ने कहा, “नाश्ता लोग खुद ले आएँ तो काम आसान होगा। एक छोटा मैसेज लिखो।”
फोन ने लिखा: सभी सदस्य अपने घर से एक छोटा योगदान लेकर आएँ। हम मिलकर इस बैठक को सफल बनाएँगे।
शाम पाँच बजे पहला योगदान आया—स्टील की दस प्लेटें। दूसरे पड़ोसी कुर्सी उठा लाए। गुप्ता जी बिजली का लंबा तार लेकर आए। “पुराना है, पर काम करता है।” एक बच्चा दो सौ रुपये लेकर खड़ा था। उसकी मम्मी ने कहा था कि बिल्डिंग बचाने हैं।
शर्मा जी बोले, “खाने का योगदान!” सबने एक साथ फोन निकाले और मैसेज दिखाया। खाने का कहीं जिक्र नहीं था।
पत्नी रसोई से निकलीं। “प्रोफेशनल भाषा?”
“बस थोड़ा मिसकम्युनिकेशन है।”
“समोसे मँगाओ।”
शर्मा जी ने फोन से कहा, “बीस लोगों के लिए समोसे का हिसाब दो।” फोन ने प्रति व्यक्ति दो समोसे मानकर चालीस का सुझाव दिया। शर्मा जी ने दुकान पर फोन किया। दुकानदार बोला, “चालीस नहीं हैं। अट्ठाईस हैं।”
शर्मा जी ने यह बात असिस्टेंट को बताई। जवाब आया: समोसे बराबर बाँट दें। जरूरत हो तो छोटे हिस्से कर सकते हैं।
गुप्ता जी ने झाँककर पढ़ लिया। “हमारी बिल्डिंग के बड़े बदलावों में अब आधा समोसा भी शामिल है?”
मीटिंग शुरू हुई। शर्मा जी ने फोन से बनाया एजेंडा पढ़ा। तीसरा मुद्दा था: सामूहिक स्थानों के बेहतर उपयोग पर विचार। सबकी नजर लॉबी में रखी गुप्ता जी की साइकिल पर गई। गुप्ता जी ने अपनी प्लेट मेज पर रख दी।
“इसमें मेरा नाम कहाँ है?”
“नाम किसी का नहीं है।”
“पर देख सब मुझे रहे हैं।”
अगले बीस मिनट साइकिल की उम्र, उसके भावनात्मक महत्व और इस बात पर बहस हुई कि लॉबी सामूहिक है तो साइकिल भी सामूहिक क्यों नहीं है। पानी की टंकी पर किसी ने बात नहीं की।
तब पत्नी ने फोन उठाया और साफ मैसेज लिखा: कल सुबह नौ से ग्यारह बजे तक पानी की टंकी की सफाई होगी। पहले पानी भर लेना।
मीटिंग में पहली बार सब चुप हुए। नीचे वाली आंटी बोलीं, “अच्छा, बस ये करना था?”
अगले दिन टंकी साफ हो गई। शर्मा जी ने असिस्टेंट से मीटिंग का सार माँगा। फोन ने लिखा: बैठक में सदस्यों ने सक्रिय भागीदारी दिखाई। संसाधन साझा किए गए। सामूहिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
शर्मा जी काफी देर तक स्क्रीन देखते रहे। फिर बोले, “तुम मेरी तरफ हो या गुप्ता जी की?”
फोन बोला, “मैं निष्पक्ष मदद करने के लिए हूँ।”
उसी समय ग्रुप में नया मैसेज आया। गुप्ता जी ने लिखा था: अगली मीटिंग का मैसेज भाभी जी ही भेजें।
नीचे उन्नीस अंगूठे लगे थे। बीसवाँ शर्मा जी ने खुद लगा दिया।
कहानी के पीछे का खयाल
इस कहानी में मजाक फोन से ज्यादा उस मैसेज पर है जो सुनने में अच्छा लगता है, पर पड़ोसियों को समझ ही नहीं आता कि करना क्या है।
मेरी पसंद की कहानियाँ (0)
इसी browser में सेव हैं। Browser का डेटा साफ करने पर हट जाएँगी।
अभी कोई कहानी सेव नहीं है। कहानी खोलकर सेव करें।