हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
नमक वाली जलेबी
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

रविवार के मेले में नीलम पहली बार अपना ठेला लगा रही थी। बोर्ड पर उसने साफ़ लिखा था: “गरम जलेबी, ठंडी शिकायतें स्वीकार हैं।” नीचे उसके पति ने चुपके से जोड़ दिया था: “उधार नहीं।”
सुबह छह बजे तक सब ठीक था। फिर नीलम ने चाशनी चखी।
वह चाशनी नहीं, मीठे होने का अभिनय करता हुआ समुद्र था।
पिछली रात पति राकेश ने रसोई समेटते हुए नमक और चीनी एक जैसे डिब्बों में भर दिए थे। अब वह कड़ाही से दो हाथ दूर खड़ा कह रहा था, “रंग तो बहुत अच्छा है।”
नीलम ने उसे ऐसा देखा कि वह तुरंत चीनी खरीदने निकल गया।
तब तक पहले ग्राहक आ गए। सामने वाली दुकान के असलम चाचा ने एक जलेबी उठाई। नीलम रोकती, उससे पहले वह खा चुके थे।
कुछ पल उन्होंने आँखें बंद रखीं।
“कैसी है?” लौटते ही राकेश ने पूछ लिया।
“तुम्हारी शादी बचाने लायक जवाब सोच रहा हूँ,” चाचा बोले।
नीलम हँस पड़ी। सुबह से पहली बार उसके कंधे ढीले हुए। उसने खराब चाशनी हटाई, बर्तन धोए और नई चाशनी चढ़ा दी। बिना चाशनी की कुछ जलेबियाँ अलग थाली में बची थीं। चाचा उन्हें घूर रहे थे।
“ये मीठी नहीं हैं?”
“अभी नहीं।”
“तो देना ज़रा।”
उन्होंने अपनी कचौड़ी की दुकान से दही, भुना जीरा और हरी चटनी मँगाई। एक कुरकुरी जलेबी तोड़ी, सब ऊपर डाला और नीलम की ओर बढ़ा दिया।
“अब तुम्हारी बारी।”
स्वाद अजीब था। फिर अच्छा था। फिर दूसरी कटोरी खाने का मन हुआ।
दस बजे तक ठेले पर दो कतारें थीं। एक मीठी जलेबी की, दूसरी उस चीज़ की जिसका नाम हर ग्राहक अलग रख रहा था। किसी ने जलेबी चाट कहा, किसी ने गोलगप्पे की बुआ।
राकेश नया बोर्ड लिखने बैठा: “हमारा अनोखा आविष्कार।”
“हमारा?” नीलम ने पूछा।
उसने चुपचाप शब्द काट दिया। चाचा ने दूसरा स्टूल खींच लिया और हिसाब समझाने लगे। दही और चटनी के पैसे भी जुड़ेंगे। भीड़ देखकर दाम घटाने की ज़रूरत नहीं थी।
शाम को आख़िरी कटोरी बिकी तो नीलम ने तीन हिस्सों में कमाई बाँटी: सामान, बचत और चाचा की साझेदारी। राकेश को दो खाली डिब्बे मिले।
“मेरा हिस्सा?”
“इन पर नाम लिखो,” उसने कहा। “कल भी दुकान खोलनी है।”
कहानी के पीछे का खयाल
मौलिक काल्पनिक कहानी। गलती के बाद नीलम और असलम चाचा मिलकर नया रास्ता निकालते हैं। आवरण मौलिक चित्र है, किसी असली मेले की फोटो नहीं।
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