हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
तीन सेकंड
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।
इकसठ साल के रघुवीर ने तैराकी का फॉर्म भरते समय पेशे वाले खाने में पहले “बस चालक” लिखा, फिर उसके आगे “सेवानिवृत्त” जोड़ दिया।
अनुभव वाले खाने में लिख दिया: बत्तीस साल।
काउंटर पर बैठी लड़की ने पूछा, “तैरने का?”
उन्होंने कागज वापस खींच लिया।
पहले दिन पूल के किनारे वे चप्पलें ऐसे जमाकर बैठे, जैसे बस को ढलान पर खड़ा किया हो। पानी में पाँच बच्चे थे और एक प्रशिक्षिका, जिसका नाम मीरा था।
“सीढ़ी से उतरिए,” उसने कहा।
“पहले गहराई बताइए।”
“यहाँ आप खड़े हो सकते हैं।”
“खड़े होने की बात अलग है।”
मीरा ने बहस नहीं की। वह सीढ़ी के पास आकर रुक गई।
रघुवीर ने तीसरे पायदान पर बीस मिनट बिताए। घर लौटकर पत्नी ने पूछा तो बोले, “जगह ठीक है। व्यवस्था देखी आज।”
अगली सुबह उन्होंने तौलिया बैग में सबसे नीचे रखा।
तीसरे दिन साथ सीख रहे एक लड़के ने पूछा, “दादाजी, आपको भी डर लगता है?”
रघुवीर के पास तैयार जवाब था: नहीं, बस पानी ठंडा है।
लेकिन लड़का इंतजार कर रहा था।
“हाँ,” उन्होंने कहा।
“मुझे नाक में पानी जाने से।”
“मुझे पैर छूटने से।”
लड़के ने गंभीरता से सिर हिलाया। दोनों की परेशानियाँ अलग थीं, पर किसी ने किसी को छोटा नहीं बताया।
एक हफ्ते बाद मीरा ने उन्हें पानी पर पीठ के बल टिकना सिखाया। उसका हाथ उनकी पीठ के नीचे था। रघुवीर छत की नीली पट्टी देखते रहे।
“अभी छोड़ना मत,” उन्होंने कहा।
“नहीं छोड़ रही।”
उन्होंने फिर पूछा। मीरा ने फिर वही जवाब दिया।
जब उन्होंने खुद कहा, तभी उसने हाथ हटाया।
तीन पल बाद रघुवीर घबराकर खड़े हो गए। पानी उनकी ठुड्डी से टपक रहा था। कोई ताली नहीं बजी। पास वाले हिस्से में बच्चे अब भी पानी उछाल रहे थे।
“हुआ?” उन्होंने पूछा।
“हुआ।”
घर पहुँचकर उन्होंने पहली बार गीला तौलिया छिपाने के बजाय बरामदे की रस्सी पर फैलाया।
“आज व्यवस्था कैसी थी?” पत्नी ने पूछा।
“तीन सेकंड तैरा।”
उसने चाय आगे कर दी। “कल चार?”
“पता नहीं।”
फिर उन्होंने बैग से फीस की रसीद निकाली। पीछे अगले महीने की तारीख लिखी थी।
“लेकिन जाऊँगा।”
कहानी के पीछे का खयाल
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