हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
खामोशी का इनाम
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

नगर पुस्तकालय की नई कुर्सी बैठते ही चीं-चीं करती थी। उसे लौटाने के बजाय कमला जी ने घोषणा कर दी, “रविवार को मौन प्रतियोगिता होगी। विजेता को यह कुर्सी मिलेगी।”
“हारने वाले को क्या मिलेगा?” अखबार पढ़ते हरि बाबू ने पूछा।
“शांति।”
रविवार को बारह लोग आ गए। नियम आसान थे: बीस मिनट तक किताब पढ़नी थी। कोई बोला, तो बाहर। कमला जी ने मेज पर घड़ी रखी और उँगली होंठों पर लगा ली।
पहले मिनट में मिश्रा जी ने पूछा, “खाँस सकते हैं?”
कमला जी ने दरवाजा दिखा दिया।
चौथे मिनट में रजनी की कुर्सी चीं बोली। सामने बैठे बबलू का चेहरा लाल हो गया। उसने हँसी रोकने के लिए किताब में मुँह छिपा लिया।
छठे मिनट में बाहर से आवाज आई, “गरम समोसे!”
हरि बाबू आदतन बोले, “दो!” फिर दोनों हाथों से अपना मुँह बंद कर लिया।
समोसे आए। उन्हें बाहर बैठकर खाने पड़े।
अब भीतर दस लोग और समोसों की खुशबू थी।
बारहवें मिनट में रजनी ने हाथ उठाया। कमला जी ने कागज दिया। उसने लिखा, “इस जासूसी उपन्यास का दूसरा भाग है?”
कमला जी मुस्कराईं। अलमारी से अगला भाग निकालने लगीं, तभी बबलू के पेट ने लंबी गुड़गुड़ाहट की।
सबने उसकी तरफ देखा।
उसने कागज पर लिखा, “यह मेरी आवाज नहीं है।”
रजनी हँस पड़ी। बबलू भी। फिर पूरा कमरा हँसने लगा।
केवल पीछे बैठे सलीम साहब चुप रहे।
कमला जी ने घड़ी देखी। अभी तीन मिनट बाकी थे। उन्होंने सलीम साहब के सामने विजेता वाली कुर्सी सरका दी।
वह जोर से चीं बोली।
सलीम साहब ने किताब से नजर उठाए बिना अपनी जेब से छोटी तेल की शीशी निकाली। जोड़ में दो बूँद डालीं। कुर्सी शांत हो गई।
घंटी बजी।
“आप जीत गए!” कमला जी बोलीं।
सलीम साहब ने आखिर किताब बंद की।
“कुर्सी यहीं रखिए। घर पर मुझे पढ़ने कौन देता है!”
“कौन नहीं पढ़ने देता?”
“मेरी पत्नी। कहती हैं, पहले पुस्तकालय की चीं-चीं ठीक करके आइए। तीन दिन से शिकायत कर रही हैं।”
कहानी के पीछे का खयाल
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