हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
एक ट्रॉफी, दो बैंड
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

नगर की परेड में इस बार केवल एक बैंड बजने वाला था। चयन के लिए रविवार को मुकाबला रखा गया।
“नया भारत बैंड” के मालिक नंदू ने अपनी तुरही चमकाई। सामने “नव भारत बैंड” के मालिक बबलू ने उससे भी चमकदार टोपी पहन ली।
दोनों की दुकानें आमने-सामने थीं। दोनों अपने बोर्ड पर “शहर का सबसे पुराना” लिखते थे, जबकि शहर में सबको उनकी पहली लड़ाई याद थी।
मुकाबले के दिन प्रवेश द्वार पर सिर्फ एक पर्ची मिली: “नया नव भारत बैंड।”
“छपाई की गलती है,” नंदू बोला।
आयोजक ने घड़ी देखी। “गलती आपकी लिखावट की है। मंच पर पाँच मिनट बाद पहुँचना है।”
बबलू ने कहा, “पहले मेरा बैंड जाएगा।”
“वर्णमाला में नया पहले आता है।”
“पर उम्र में मैं बड़ा हूँ।”
“बालों की उम्र मत जोड़ो।”
पीछे खड़े ढोलवाले ने खाँसकर बताया कि बाकी सारे बैंड अपने कार्यक्रम पूरे कर चुके हैं। अब मंच पर गए, तो दोनों साथ जाएँगे।
उन्होंने बीच में सफेद चाक की रेखा खींची। नंदू के लोग बाईं तरफ, बबलू के दाईं तरफ। दोनों अपने-अपने गीत बजाने लगे।
पहले दस सेकंड में निर्णायक ने चश्मा उतार दिया।
फिर नंदू की धुन बबलू के ढोल की लय में अटक गई। नंदू ने उसे पकड़ लिया। बबलू ने तुरही के लिए जगह छोड़ी। झाँझवाला, जो दोनों दुकानों में आधी-आधी नौकरी करता था, पहली बार पूरी तनख्वाह जितना खुश दिखाई दिया।
तालियाँ देर तक बजती रहीं।
परेड का ठेका संयुक्त बैंड को मिला।
पुरस्कार में एक ही ट्रॉफी थी।
“सोमवार, बुधवार, शुक्रवार मेरे पास,” नंदू ने कहा।
“रविवार?” बबलू ने पूछा।
दोनों फिर तन गए।
झाँझवाले ने ट्रॉफी उठाई और दोनों दुकानों के बीच चायवाले की मेज पर रख दी।
अगली सुबह उसके नीचे नया बोर्ड लगा था:
“शहर का सबसे पुराना संयुक्त बैंड। स्थापना: कल।”
नंदू ने “पुराना” काटना चाहा। बबलू ने उसका हाथ रोक लिया।
“कुछ तो हमारा अपना रहने दो।”
कहानी के पीछे का खयाल
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