हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
सत्रह नंबर का नारंगी रंग
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गोपाल पेंटर को उस सुबह दो हिदायतें मिली थीं: दीवार गहरे नारंगी रंग की हो और काम ग्यारह बजे तक खत्म हो जाए।
शर्मा जी ने फोन पर कहा था, “फ्लैट सत्रह। दरवाजा खुला मिलेगा। पैसे मेज पर रखे हैं।”
सत्रह का अंक थोड़ा टेढ़ा था, लेकिन दरवाजा खुला था और मेज पर पैसे भी थे। गोपाल ने सामान खोला। नौ बजे तक पहली परत चढ़ गई।
तभी भीतर से एक बुजुर्ग महिला निकलीं।
“अच्छा हुआ तुम आ गए,” उन्होंने कहा। “कब से कह रही थी कि इस घर को रंग चाहिए।”
“शर्मा जी ने बढ़िया रंग चुना है।”
“शर्मा कौन?”
गोपाल का रोलर हवा में रुक गया।
महिला ने चश्मा लगाया। “मैं वर्मा हूँ। और यह फ्लैट ग्यारह है।”
बाहर जाकर गोपाल ने देखा। दूसरे एक के ऊपर टेप का टुकड़ा चिपका था। दूर से वह सात लगता था।
असली सत्रह नंबर से फोन आया।
“कहाँ पहुँचे?”
“रंग तक पहुँच गया हूँ,” गोपाल ने कहा। “आप तक अभी पहुँचना है।”
वर्मा जी ने नारंगी दीवार देखी। गोपाल ने तुरंत उसे पुराना सफेद रंग लौटाने का वादा किया।
“पुराना रंग तो पंद्रह साल से झेल रही हूँ,” उन्होंने कहा। “पहले एक काम करो।”
उन्होंने दीवार के सामने रखी भूरी अलमारी हटवाई। उसके पीछे का हिस्सा सफेद था।
“यह बीच में सफेद क्यों?”
“अलमारी थी।”
“अब नहीं है। इसे भी रंगो।”
गोपाल ने घड़ी देखी। साढ़े नौ।
वह सत्रह नंबर भागा, अपनी गलती बताई और बची हुई पेंट की बाल्टी दिखाई। शर्मा जी भड़के। उनकी ऑनलाइन बैठक बारह बजे थी; पीछे की दीवार कैमरे पर दिखनी थी।
गोपाल ने पड़ोस में काम कर रहे अपने साथी को बुलाया। दोनों ने फर्नीचर ढका, दीवार रंगी और पंखे चलाए। दस बजकर चालीस मिनट पर आखिरी छींटा साफ हुआ।
मजदूरी का आधा हिस्सा साथी को मिला। बाकी से वर्मा जी की दीवार पूरी करने का रंग आया।
शाम को वर्मा जी ने उसे चाय दी।
“मेज पर पैसे किसलिए थे?” गोपाल ने पूछा।
“दूधवाले के लिए।”
जाते समय गोपाल ने ग्यारह के ऊपर से टेप उतारा। फिर अपने फोन में काम का नया नियम लिखा:
रंग खोलने से पहले ग्राहक से हाथ मिलाना।
कहानी के पीछे का खयाल
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