हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
नारंगी धागा
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गोदाम बंद होने में दस मिनट थे, जब रफ़ीक़ ने पर्ची पर बारह कालीन गिने और ट्रक में तेरह रस्सियाँ देखीं।
“तेरहवीं खाली है,” चालक ने कहा। “पुरानी पैकिंग।”
रफ़ीक़ ने सिर हिला दिया। दुकान में उसका पहला महीना था। मालिक ने साफ कहा था, सवाल कम, काम ज्यादा।
उस सुबह दुकान का सबसे पुराना कालीन गायब हुआ था। नीले फूलों वाला, जिसके एक कोने में पीला तोता था। मालिक ने पुलिस को खबर दी थी और कर्मचारियों के थैले खुलवाए थे। रफ़ीक़ का टिफिन भी।
अब ट्रक में केवल सस्ते, मशीन से बने कालीन जाने थे।
उसने आखिरी गट्ठे के नीचे हाथ लगाया। बाकी गट्ठों से भारी था।
“गीला है,” चालक बोला।
बाहर तीन सप्ताह से बारिश नहीं हुई थी।
रफ़ीक़ ने रस्सी ढीली करनी चाही। चालक ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“कल खोल लेना। ग्राहक इंतजार कर रहा है।”
दुकान के भीतर मालिक शटर खींच रहे थे।
रफ़ीक़ ने ऊँची आवाज में कहा, “इसमें चूहा है!”
मालिक तुरंत पलटे। चूहों से उन्हें चोरी से भी ज्यादा डर लगता था।
“नीचे उतारो!”
चालक बोला, “लड़का मजाक कर रहा है।”
तभी गट्ठे के सिरे से नारंगी धागे का छोटा फंदा दिखा। रफ़ीक़ उसे पहचानता था। पिछले हफ्ते उसने नीले कालीन का फटा किनारा सीया था। सही रंग नहीं मिला था, इसलिए उसने भीतर नारंगी धागा लगाया था।
उसने जेब से छोटी कैंची निकाली और रस्सी काट दी।
सस्ता कालीन खुला। उसके भीतर नीले फूल थे। पीला तोता भी।
चालक भागने को मुड़ा, लेकिन मालिक पहले ही दरवाजे पर खड़े थे।
बाद में पुलिस बयान लिख रही थी, तब मालिक रफ़ीक़ के पास आए।
“पहले क्यों नहीं बताया?”
रफ़ीक़ ने अपना खुला टिफिन बंद किया।
“पहले यकीन नहीं था।”
अगली सुबह माल गिनने की मेज पर नई कैंची रखी थी। उसके साथ दुकान की एक चाबी।
रफ़ीक़ ने दोनों उठाईं। फिर पहली पर्ची पर लिखा: बारह कालीन। खोलकर गिने।
कहानी के पीछे का खयाल
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