हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
बंद सड़क की घोषणा
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

रात के दो बजे रेडियो मधुबन पर गाना खत्म ही हुआ था कि स्टूडियो का फोन बजा।
“ट्रैफिक चौकी से बोल रहा हूँ। पुराने पुल में दरार आ गई है। भारी गाड़ियाँ ईंटभट्ठे वाले रास्ते से निकलें। तुरंत घोषणा कर दीजिए।”
तारा ने पेन उठाया। रात की ड्यूटी में गाने चलाने से लेकर माइक सँभालने और चाय बनाने तक, सब वही करती थी।
“आपका नाम?”
“उपनिरीक्षक चौहान। सुबह लिखित सूचना आ जाएगी।”
पीछे वायरलेस की खरखराहट सुनाई दे रही थी। किसी ने कहा, “सत्रह, जवाब दो।” फिर दो छोटी बीप हुईं।
तारा ने पुल का नाम दोहराकर पुष्टि की और फोन रख दिया। घोषणा का कागज माइक्रोफोन के पास रखा, लेकिन लाल बत्ती नहीं जलाई।
चौहान को वह जानती थी। पिछले महीने यातायात कार्यक्रम में आए थे। फोन पर आवाज भारी थी, पर खराब लाइन में ऐसा हो सकता था।
उसने चौकी का नंबर मिलाया। कोई जवाब नहीं। फिर चौहान का वह मोबाइल नंबर ढूँढ़ा, जो कार्यक्रम की पुरानी फाइल में था। फोन बंद था।
दूसरा गाना लगाने तक पहला आदमी फिर फोन पर आ गया।
“अभी तक घोषणा नहीं हुई?”
“कितनी देर के लिए रास्ता बंद है?”
“सुबह तक। जल्दी कीजिए। दुर्घटना हुई तो जिम्मेदारी आपकी होगी।”
पीछे फिर वही आवाज आई, “सत्रह, जवाब दो।” वही दो बीप।
इस बार तारा के हाथ से पेन छूट गया।
यह खरखराहट उसने पहले सुनी थी। रेडियो के अपराध नाटक में। तीन साल पहले उसी ने ध्वनि प्रभावों की फाइल बनाई थी। वायरलेस वाले टुकड़े में कलाकार की छींक कट नहीं पाई थी; बीप के बाद बहुत हल्की बच गई थी।
उसने फोन कान से सटाया।
छींक आई।
“आप लाइन पर रहिए,” तारा ने कहा। “रास्ते का सही नाम लिख लूँ।”
“ईंटभट्ठा। कितनी बार बताऊँ?”
तारा ने फोन का माइक्रोफोन बंद किया। दूसरे मोबाइल से स्टेशन प्रबंधक को जगाया। पहले तो उन्होंने नींद में झुँझलाकर समय पूछा। फिर तारा ने कहा, “सर, कोई हमारा ही नाटक बजाकर पुलिस बन रहा है।”
उन्होंने सीधे जिले के नियंत्रण कक्ष से संपर्क किया। वहाँ पुल बंद होने की कोई सूचना नहीं थी।
तारा ने फोन दोबारा खोला।
“घोषणा तैयार है। ईंटभट्ठे वाला मोड़ पुल से पहले पड़ेगा या बाद में?”
आदमी कुछ क्षण चुप रहा।
“पहले।”
“वहाँ तो बैरियर रहता है।”
“आज खुला है।”
तारा ने यह बात प्रबंधक को लिखकर भेज दी।
नियंत्रण कक्ष ने उसे कोई घोषणा न करने को कहा। पुलिस की गाड़ी निकल चुकी थी। तारा ने अगले गाने का परिचय दिया। उसकी आवाज इतनी सामान्य निकली कि उसे खुद पर आश्चर्य हुआ। मेज के नीचे उसके घुटने काँप रहे थे।
पौने तीन बजे खबर मिली। मोड़ पर नकली संकेतक लगे थे। भट्ठे की सुनसान सड़क पर एक खाली ट्रक और तीन आदमी मिले थे। वे रेडियो की घोषणा का इंतजार कर रहे थे।
सुबह चौहान स्टूडियो आए। उनकी रात की ड्यूटी नहीं थी।
“पहचाना कैसे?” उन्होंने पूछा।
तारा ने पुरानी ध्वनि फाइल चलाई। खरखराहट, आवाज, बीप, छींक।
“इसे साफ कर दूँ?” प्रबंधक ने कहा।
“इसकी एक कॉपी पुलिस को दे दीजिए,” तारा बोली। फिर उसने फाइल के नाम में जोड़ दिया: ‘नाटक के लिए।’
कहानी के पीछे का खयाल
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