हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
आईना हाज़िर हो
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

नीलिमा का पहला अपना केस पाँच आदमियों की तस्वीर पर टिका था। मुश्किल यह थी कि उनमें से दो का कोई पता, परिवार या जन्मतिथि नहीं थी।
वे केवल तस्वीर में रहते थे।
नगर के शिकायत सुनवाई कक्ष के बाहर रिक्शाचालक बशीर ने उसे चालान दिया। अनुमति से अधिक सवारियाँ बैठाने का जुर्माना था। साथ लगी तस्वीर में बशीर, उसका रिक्शा और पाँच सिर दिख रहे थे।
“मैंने दो आदमी बैठाए थे,” उसने कहा।
“फिर बाकी?”
“यही तो आप पता करेंगी। फीस इसी बात की है।”
नीलिमा ने तस्वीर बड़ी करवाई। एक यात्री सफेद टोपी पहने था, दूसरा हरी कमीज। पीछे फिर सफेद टोपी और हरी कमीज। आखिरी सिर स्वयं बशीर का था।
“जुड़वाँ भाई?”
“दोनों?”
नीलिमा ने जवाब देने के बजाय चाय मँगाई।
तस्वीर में सफेद टोपी वाले के हाथ में भी कागज़ का कप था। नीलिमा ने अपना कप घुमाया। उस पर छपे दुकान के नाम को देखा। फिर तस्वीर देखी।
“यह रिक्शा कहाँ खड़ा था?”
“काँच बाजार में। अकरम की दुकान के बाहर।”
अगली सुबह नीलिमा सुनवाई में एक आदमी जितना लंबा आईना लेकर पहुँची। उसे दरवाजे से अंदर करने में दो चपरासियों और तीन अनचाही सलाहों की मदद लगी।
अधिकारी वर्मा ने चश्मा उतारा।
“यह अदालत है, नाई की दुकान नहीं।”
“नगर आपत्ति कक्ष है, महोदय,” नीलिमा ने कहा। “और यह गवाह है।”
बशीर ने तुरंत आईने की ओर हाथ जोड़ दिए।
वर्मा ने उसे घूरा। नीलिमा ने आईना दीवार से टिकाया और चालान बनाने वाले कर्मचारी को उसके सामने खड़ा किया।
“यहाँ कितने कर्मचारी हैं?”
“एक।”
“तस्वीर में?”
कर्मचारी ने सामने अपना दूसरा चेहरा देखा। फिर सावधानी से बोला, “कैमरा कहाँ रखेंगे?”
नीलिमा मुस्कराई। आखिर किसी ने सही प्रश्न पूछा था।
उसने काँच बाजार की नई तस्वीरें मेज पर रखीं। अकरम ने उस दिन दुकान के बाहर बड़ा आईना रखा था। यात्री उसी के सामने रुके थे। चालान की तस्वीर तिरछे कोण से ली गई थी। आईने का किनारा रिक्शे की छत के पीछे छिप गया था।
सफेद टोपी वाला आदमी दो बार दिखाई दिया था। हरी कमीज वाला भी। बशीर बीच में केवल एक बार।
“कप पर दुकान का नाम देखिए,” नीलिमा ने कहा। “एक सीधा है, दूसरा उल्टा।”
कर्मचारी झुककर देखने लगा। वर्मा ने चश्मा लगाया।
कुछ देर बाद उन्होंने जुर्माना रद्द कर दिया।
“आगे से तस्वीर ध्यान से लेना,” उन्होंने कर्मचारी से कहा।
बशीर ने राहत की साँस ली। “अब इस गवाह को वापस पहुँचाना है।”
बाहर आईना रिक्शे पर रखते समय नीलिमा ने अपनी फीस का जिक्र किया।
बशीर ने जेब से तय रकम निकाल दी।
“किराया अलग लगेगा,” उसने कहा।
“मेरा?”
“आपका, आईने का और उसे दुकान तक उठाने का।”
नीलिमा ने आईने में अपनी शक्ल देखी। बशीर इंतजार कर रहा था।
“ठीक है,” उसने कहा। “लेकिन इसमें दिखाई देने वाली वकील मुफ्त जाएगी।”
कहानी के पीछे का खयाल
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