हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
हँसी का हिसाब
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

मीरा का पहला पेशेवर कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही आधा बिगड़ गया था। सामने की मेज़ पर कंपनी के अकाउंटेंट सक्सेना जी बैठे थे। उनके हाथ में छोटा क्लिक काउंटर था। वे उसका बटन दबाते तो खट की आवाज़ आती।
“यह किसलिए?” मीरा ने पूछा।
“भुगतान के लिए। हर हँसी के सौ रुपये। अधिकतम पाँच हज़ार। जैसा फ़ोन पर तय हुआ था।”
मीरा को लगा था कि वह मज़ाक कर रहे हैं। उसने फ़ोन पर हँस भी दिया था। शायद वही उसकी पहली मुफ़्त हँसी थी।
तीन महीने से वह छोटे मंचों पर बिना पैसे लिए शो दे रही थी। आज की कमाई से उसे अगले महीने की अभिनय कार्यशाला की फीस भरनी थी। उसने माइक पकड़ा और अपना सबसे भरोसेमंद चुटकुला सुनाया।
पहली पंक्ति में एक महिला हँसीं। फिर तुरंत कंपनी के मालिक को देखने लगीं। मालिक चुप थे, इसलिए महिला भी चुप हो गईं।
खट।
“सौ रुपये,” सक्सेना जी ने धीरे से कहा।
दूसरे चुटकुले पर तीन लोग हँसे।
खट।
मीरा रुक गई। “तीन लोग थे।”
“लेकिन चुटकुला एक था।”
“हमारी बात हँसी पर हुई थी, चुटकुले पर नहीं।”
पीछे की मेज़ से किसी ने कहा, “बिल्कुल!”
सक्सेना जी ने पलटकर देखा। आवाज़ बंद हो गई।
मीरा ने अपने लिखे हुए पन्ने मोड़े। मालिक अब भी घड़ी देख रहे थे। कार्यक्रम के बारह मिनट बचे थे और उसकी कमाई दो सौ रुपये थी। इतने में घर लौटने का किराया निकलता, कार्यशाला की फीस नहीं।
“एक बात साफ़ कर लें,” उसने कहा। “अगर कोई मेरे चुटकुले पर देर से हँसे, तो रकम आज मिलेगी या अगले महीने?”
चार लोग हँसे।
सक्सेना जी का हाथ बटन पर रुक गया।
“और अगर एक आदमी हँसते-हँसते खाँसने लगे? आधा भुगतान?”
इस बार मालिक के मुँह से भी छोटी-सी हँसी निकली। उसके पीछे पूरी मेज़ हँस पड़ी।
खट-खट-खट।
“आपने अभी तीन बार दबाया,” मीरा ने कहा। “यह बोनस है या हिसाब बदल गया?”
सक्सेना जी के कान लाल होने लगे। मीरा ने उन्हें देखा और अपना अगला वाक्य बदल दिया।
“वैसे गलती मेरी है। मैंने पहली नौकरी में एक वाक्य लिखा था: मैं किसी भी परिस्थिति में लोगों को हँसा सकती हूँ। आज पता चला, आवेदन पढ़े भी जाते हैं।”
सक्सेना जी हँस दिए। काउंटर उनकी गोद में पड़ा रहा।
“अपनी हँसी भी जोड़िए,” मीरा ने कहा। “आप कंपनी के पैसे बचाते-बचाते मेरा नुकसान कर देंगे।”
अब वह अपने पहले असफल कार्यक्रम की कहानी सुनाने लगी, जहाँ केवल छह लोग आए थे और उनमें दो अगले कार्यक्रम की कुर्सियाँ लेने आए थे। फिर उस ऑडिशन का किस्सा सुनाया जिसमें उसने पेड़ का अभिनय किया और निर्देशक ने कहा, थोड़ा स्वाभाविक रहिए।
बीच-बीच में सक्सेना जी गिनती भूल जाते। फिर पीछे से कोई संख्या बता देता। एक ही हँसी के लिए तीन अलग संख्याएँ आने लगीं।
कार्यक्रम के बाद उन्होंने काउंटर मेज़ पर रख दिया।
“इसमें बयालीस हैं,” उन्होंने कहा। “आठ का हिसाब छूट गया होगा।”
उन्होंने पूरे पाँच हज़ार रुपये गिने। मीरा ने रसीद पर साइन किए।
“अगली बार भी आएँगी?”
मीरा ने पैसे सँभाले। “पाँच हज़ार तय। गिनती नहीं।”
सक्सेना जी ने कुछ सोचा। “और अगर कोई नहीं हँसा?”
“तो आप लोग अगली बार किसी और को बुला लीजिएगा।”
वह हँसे। मीरा ने मेज़ से काउंटर उठाया और आख़िरी बार बटन दबाया।
खट।
कहानी के पीछे का खयाल
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