हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
खुल्ले नहीं हैं
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

पहले ही चक्कर में किसी ने रमा को पाँच सौ का नोट थमा दिया।
“आठ रुपये की टिकट है,” उसने कहा।
आदमी ने दोनों जेबें थपथपा दीं, मानो खाली जेबों से अब कुछ निकल नहीं सकता था।
दूसरे यात्री के पास दो सौ थे। तीसरे के पास सौ। बस अड्डे पर चायवाले ने भी हाथ खड़े कर दिए।
रमा ने टिकटों के पीछे बाकी रकम लिखनी शुरू कर दी।
“उतरने से पहले ले लेना।”
हर मोड़ पर कोई अपनी टिकट उसके सामने कर देता। हर मोड़ पर वह कहती, “बस, अगले स्टॉप पर।”
बाज़ार आया तो पाँच सौ वाला आदमी बिना आवाज़ दिए उतर गया। रमा दरवाज़े तक पहुँची, लेकिन भीड़ में उसकी नीली कमीज़ गायब हो चुकी थी।
शाम को हिसाब मिलाते समय उसके बैग में चार सौ बानवे रुपये ज़्यादा थे।
ड्राइवर बोला, “कल आ जाएगा।”
रमा ने बाकी यात्रियों का बकाया लौटा दिया। बचे चार सौ बानवे रुपये अलग लिफ़ाफ़े में रखे और ऊपर लिखा: नीली कमीज़, बाज़ार।
अगले दिन उसने हर चढ़ते आदमी को ध्यान से देखा। नीली कमीज़ नहीं आई। तीसरे दिन भी नहीं।
चौथे दिन एक लड़का मुड़ी हुई टिकट लेकर चढ़ा।
“पापा ने पैसे मँगवाए हैं।”
टिकट के पीछे रमा की लिखावट थी। फिर भी उसने पूछा, “कहाँ उतरे थे?”
“बाज़ार। नीली शर्ट थी।”
उसने लिफ़ाफ़ा निकाला।
लड़का हँस पड़ा। “उन्होंने बताया था आप शर्ट से पहचानोगी।”
पैसे गिनकर उसने जेब में रखे और उतरने लगा।
“तेरी टिकट?”
लड़का ठिठक गया। “अगले स्टॉप तक ही जाना है।”
“तो आठ रुपये।”
उसने अभी मिले नोटों में से सौ का नोट निकाल दिया।
रमा कुछ पल उसे देखती रही। फिर दोनों हँस पड़े।
“रुक, अभी चार सौ बानवे दिए हैं। आठ खुल्ले उसी में होंगे।”
लड़के ने दोबारा जेब टटोली। इस बार उसने सारे नोट नहीं निकाले, बस सिक्के हथेली पर रखे।
रमा ने आठ रुपये लिए, टिकट काटी और खाली लिफ़ाफ़ा मोड़कर बैग में रख लिया।
कहानी के पीछे का खयाल
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