हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
आधी हजामत
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

रफ़ीक़ ने ग्राहक की दाईं कनपटी पर मशीन चलाई ही थी कि बिजली चली गई।
पंखा धीरे-धीरे रुका। शीशे के ऊपर लगी सफ़ेद ट्यूबलाइट भी बुझ गई।
ग्राहक ने अपना सिर घुमाकर देखा। दाईं तरफ़ बाल छोटे थे। बाईं तरफ़ अब भी कान ढका हुआ था।
“साढ़े ग्यारह बजे फोटो खिंचवानी है।”
रफ़ीक़ ने घड़ी देखी। ग्यारह बजकर दस मिनट।
“कैंची से कर देता हूँ।”
“आता है?”
यह सवाल उसे नहीं, पीछे अख़बार पढ़ रहे उसके पिता को देखकर पूछा गया था।
पिता ने अख़बार का पन्ना पलट दिया।
रफ़ीक़ ने दुकान का दरवाज़ा पूरा खोला। कुर्सी को धूप की तरफ़ खिसकाया और कंघी उठा ली।
मशीन के साथ काम आसान था। नंबर लगाओ, सिर पर चलाओ। कैंची में हर कट अपना फ़ैसला माँगता था।
उसने बाईं तरफ़ के बाल उठाए। काटे। फिर दाईं तरफ़ देखकर थोड़ा और काटा।
ग्राहक हर बार गर्दन घुमा देता।
“आप सिर सीधा रखिए।”
“तुम दोनों तरफ़ बराबर रखना।”
पीछे अख़बार के नीचे से हँसी की आवाज़ आई।
रफ़ीक़ ने पिता की तरफ़ देखा। वे अख़बार के पीछे ही रहे।
साढ़े ग्यारह से पाँच मिनट पहले उसने गर्दन से कटे बाल झाड़े और छोटा शीशा ग्राहक के पीछे रखा।
आदमी ने सिर दाएँ-बाएँ किया।
“ठीक है। कितना?”
रफ़ीक़ ने पुराना रेट बताया।
ग्राहक के जाने के बाद उसने कुर्सी वापस खींची।
“एक बार बता देते कहाँ ज़्यादा काट रहा था,” उसने कहा।
पिता ने अख़बार मोड़ा।
“तू खुद देख रहा था।”
तभी बिजली आ गई। मशीन की बत्ती जल उठी।
पिता कुर्सी पर बैठ गए और गले का बटन खोला।
रफ़ीक़ ने मशीन उठाई।
“उससे नहीं।”
उसने पिता को शीशे में देखा।
उन्होंने अपनी बाईं कनपटी की तरफ़ इशारा किया।
“कैंची से। और ज़रा बचाकर काटना। तेरी माँ को छोटे बाल पसंद नहीं हैं।”
कहानी के पीछे का खयाल
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