हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
इस साल अचार नहीं बनेगा
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

सुषमा ने रसोई की सबसे ऊँची शेल्फ़ से खाली मर्तबान उतारकर मेज़ पर रख दिए।
कुनाल ने उन्हें देखकर फोन निकाल लिया।
“आम कितने मँगाऊँ? पिछले साल बारह किलो कम पड़ गए थे।”
“इस साल आम नहीं आएँगे।”
“महँगे हैं क्या?”
“मैं जा रही हूँ।”
“कहाँ?”
“उदयपुर। निर्मला के साथ। शुक्रवार की ट्रेन है।”
कुनाल ने फोन नीचे कर दिया। माँ ने टिकट कब कराया, उससे ज़्यादा उसे यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने बताया अब था।
दोपहर तक परिवार के समूह में खबर पहुँच गई।
सबसे पहले बहन का संदेश आया: “मम्मी, मेरे दो डिब्बे अलग रख देना।”
फिर मामा ने लिखा: “इस बार तेल थोड़ा कम।”
सुषमा ने दोनों को वही जवाब भेजा: “इस साल अचार नहीं बनेगा।”
शाम को कुनाल आम लेकर घर आया।
“मैंने सोचा, तैयारी कर देता हूँ। आप बस मसाले बता देना।”
थैले में दस किलो कच्चे आम थे।
सुषमा ने एक उठाया, देखा और वापस रख दिया।
“धोकर सुखाने होंगे। फिर काटना। गुठली के पास हाथ बचाकर। कपड़े धुलेंगे अलग। धूप में रखना और बारिश आए तो उठाना। बाद में रोज़ देखना कि ऊपर की फाँकों तक तेल पहुँचा या नहीं।”
“कर लेंगे।”
“कौन?”
कुनाल ने जवाब देने से पहले थैले का मुँह मोड़ दिया।
“मैं।”
“ठीक है।”
उसे उम्मीद थी माँ अब चाकू उठा लेंगी। उन्होंने अपनी अलमारी खोल ली और सूट निकालने लगीं।
अगली सुबह कुनाल ने पहला आम काटा तो टुकड़ा मेज़ से उछलकर फ्रिज के नीचे चला गया। दूसरे आम की गुठली इतनी सख्त थी कि उसने चाकू रख दिया।
माँ दरवाज़े तक आईं।
“दुकान पर कटवा लाओ। मैं भी वहीं कटवाती हूँ।”
“पहले क्यों नहीं बताया?”
“तुमने पूछा नहीं।”
वह हँसीं नहीं। इससे कुनाल को अपनी शिकायत और बचकानी लगी।
उसने आम धुलवाकर कटवाए और घर लाकर सुखाने के लिए फैला दिए। शाम तक तीन बड़े कपड़े बालकनी में बिछे थे। उसकी बहन वीडियो कॉल पर आई तो उसने कैमरा उनकी तरफ़ घुमा दिया।
“तुम्हारे दो डिब्बों का काम सामने पड़ा है। शनिवार को आ रही हो?”
“मम्मी होंगी?”
“नहीं।”
कुछ देर बाद उसने कहा, “आ जाऊँगी।”
गुरुवार रात सुषमा ने एक कागज़ पर मसालों की मात्रा लिख दी। नीचे दुकान का नाम और दो सवालों के जवाब भी लिखे।
कुनाल ने पूछा, “ट्रेन में फोन कर सकता हूँ?”
“करना। अचार के अलावा भी कुछ बताना।”
शनिवार को बहन ने मसाले मिलाए। कुनाल ने मर्तबानों के नीचे अखबार बिछाया। थोड़ा तेल फर्श पर गिरा, दोनों में बहस हुई, फिर पोछा कौन लगाएगा यह तय हुआ।
उदयपुर से माँ की तस्वीर आई। झील के सामने, धूप का चश्मा लगाए, हाथ में कुल्फ़ी थी।
बहन ने जवाब में भरे हुए मर्तबानों की तस्वीर भेजी।
माँ ने लिखा, “ढक्कन कस दिए?”
कुनाल ने कसकर जाँचे और लिखा, “हाँ। अब आप घूमो।”
इस बार माँ ने कोई निर्देश नहीं भेजा।
कुछ देर बाद दूसरी तस्वीर आई। कुल्फ़ी खत्म हो चुकी थी।
कहानी के पीछे का खयाल
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