हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
रात की आखिरी लिफ्ट
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

पूरी इमारत में सात मंजिलें थीं। फिर भी रात के सवा बारह बजे लिफ्ट के बाहर लगी स्क्रीन पर आठ लिखा था। नेहा ने सोचा, स्क्रीन खराब होगी। उसने नीचे जाने वाला बटन दबाया।
वह पहली बार इतनी देर तक ऑफिस में रुकी थी। बाकी लोग जा चुके थे। बाहर बारिश थी और फोन की बैटरी खत्म होने वाली थी। नीचे गार्ड बैठा होगा, उसने सोचा। उससे चार्जर माँग लेगी।
लिफ्ट खुली तो अंदर एक आदमी था। उसके हाथ में गीला अखबार था। उसने जगह देने के लिए कदम पीछे किया। नेहा अंदर गई और ग्राउंड फ्लोर का बटन दबाया। आदमी ने कुछ नहीं दबाया।
“आप भी नीचे?” उसने पूछा। आदमी ने सिर हिलाया। उसकी कमीज सूखी थी, पर अखबार से पानी टपक रहा था। फर्श पर गिरती बूँदों की आवाज बहुत साफ सुनाई दे रही थी।
लिफ्ट नीचे जाने के बजाय ऊपर चल पड़ी। नेहा ने बटन दोबारा दबाया। स्क्रीन पर सात के बाद आठ आया। दरवाजा खुला। बाहर उसके ऑफिस जैसा ही गलियारा था, बस सारी कुर्सियाँ उलटी रखी थीं।
एक मेज पर उसका लाल बैग था। वही बैग उसके कंधे पर भी था। मेज वाले बैग के पास फोन पड़ा था। उसकी स्क्रीन पर माँ का नाम चमक रहा था। नेहा ने अपनी जेब टटोली। उसका फोन बंद था।
आदमी बाहर निकल गया। “फोन उठा लो,” उसने कहा। “बहुत देर से बज रहा है।” नेहा ने दरवाजा बंद करने वाला बटन दबाया। दरवाजा थोड़ा हिला और फिर खुल गया। आदमी वहीं खड़ा था।
फोन बंद हुआ। फिर दोबारा बजा। इस बार स्क्रीन पर नेहा का नाम था। उसने गलियारे में कदम नहीं रखा। अपनी जेब से बंद फोन निकाला और लिफ्ट के फर्श पर बैठ गई।
उसकी माँ हमेशा कहती थीं कि डर लगे तो कहीं भागने से पहले आसपास देख लेना। नेहा ने ऊपर देखा। इमरजेंसी बटन के पास इंटरकॉम था। उसने दबाया। पहले खरखराहट हुई, फिर गार्ड की आवाज आई। “मैडम, आप अंदर हैं?”
“आठवीं मंजिल पर हूँ।” दूसरी तरफ कुछ गिरने की आवाज आई। गार्ड ने धीरे कहा, “बाहर मत निकलना। आँखें नीचे रखो। मैं बिजली बंद करता हूँ।”
आदमी लिफ्ट के और करीब आया। उसके जूतों की आवाज नहीं थी। “नीचे वाला झूठ बोल रहा है,” उसने कहा। नेहा ने फर्श देखा। अखबार का पानी उसकी तरफ बह रहा था। उसमें छपे शब्द धीरे-धीरे फैल रहे थे।
बत्ती बुझ गई। लिफ्ट झटके से रुकी। अँधेरे में फोन बजता रहा। फिर आवाज दूर होती गई, जैसे कोई उसे लेकर गलियारे में पीछे चल रहा हो। नेहा ने साँस रोके रखी।
जब दरवाजा दोबारा खुला, सामने गार्ड था। नीचे की लॉबी में सुबह जैसी सफेद रोशनी थी। उसने नेहा को हाथ पकड़कर बाहर निकाला। उसकी नजर अखबार पर गई, जो अब लिफ्ट में अकेला पड़ा था।
“ये फिर आ गया,” गार्ड ने कहा। उसने अखबार उठाया नहीं। बस लिफ्ट का दरवाजा बंद कर दिया और उसके सामने कुर्सी रख दी।
नेहा ने चार्जर लगाया। माँ के तीन मिस्ड कॉल थे। उसने वापस फोन किया। माँ बोलीं, “अभी तो बात हुई थी। तुमने कहा ऊपर आ जाओ।” नेहा ने लॉबी के दरवाजे की तरफ देखा। बाहर उसकी माँ की टैक्सी आकर रुक रही थी।
कहानी के पीछे का खयाल
सात मंजिलों की इमारत में आठवीं मंजिल का नंबर इस कहानी का पहला डर है। आखिर में माँ का फोन उस डर को ऑफिस से बाहर भी ले आता है।
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