हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
आवाज़ नंबर सत्ताईस
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

अनुष्का ने अपने पिता को ऑडिशन की कतार में देखा तो सबसे पहले उनके हाथ में रखा संवाद-पत्र छीन लिया।
“आप यहाँ क्या कर रहे हैं?”
“इसी सवाल का जवाब नीचे लिखा है। पात्र: डाकू भैरव।”
पिता ने कागज़ वापस ले लिया।
स्टूडियो के बाहर प्लास्टिक की सात कुर्सियाँ थीं। सभी भरी हुई थीं। दीवार पर आगामी कार्टून फ़िल्म का पोस्टर लगा था। अनुष्का उस फ़िल्म में सहायक निर्देशक थी। उसने घर पर केवल इतना बताया था कि नए आवाज़ कलाकारों के ऑडिशन चल रहे हैं।
पिता ने बात ध्यान से सुन ली थी।
“आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”
“तुमने कहा था ऑनलाइन फ़ॉर्म भरना है। भर दिया।”
उनके सीने पर चिपके कागज़ पर २७ लिखा था।
अनुष्का उन्हें कोने में ले गई।
“पापा, यहाँ मज़ाक नहीं होता।”
“अच्छा है। मैं भी नौकरी से रिटायर हुआ हूँ, मज़ाक करने से नहीं।”
“आपकी आवाज़ बहुत… सीधी है।”
“टेढ़ी करके बोल दूँगा।”
उन्होंने गला साफ़ किया और दाँत भींचकर कहा, “मेरी गुफ़ा में आने की हिम्मत कैसे हुई?”
पास बैठा एक युवक हँस पड़ा। अनुष्का ने आँखें बंद कर लीं।
घर में पिता की सबसे ऊँची आवाज़ तब सुनाई देती थी जब कोई गीले हाथ से बिजली का स्विच छू लेता था। मोहल्ले के बच्चे उन्हें अपनी टूटी पतंगें दे जाते थे। ऐसे आदमी के मुँह से डाकू का संवाद सुनना उसे असहज कर रहा था।
अंदर से आवाज़ आई, “सत्ताईस!”
पिता उठे।
“बस एक बात,” अनुष्का ने कहा। “अंदर मत बताना कि मैं आपकी बेटी हूँ।”
उनके चेहरे से मुस्कान थोड़ी उतर गई।
“मैंने फ़ॉर्म में अपना नाम लिखा है।”
वे भीतर चले गए।
काँच के पीछे से अनुष्का ने देखा। पिता माइक्रोफ़ोन से बहुत दूर खड़े थे। रिकॉर्डिस्ट ने पास आने का इशारा किया। उन्होंने चश्मा लगाया और पहला संवाद पढ़ा।
आवाज़ स्कूल की प्रार्थना जैसी थी।
निर्देशक ने हाथ उठाया।
“डराना है। घोषणा नहीं करनी।”
पिता ने दूसरी बार ज़ोर लगाया। आख़िरी शब्द पर खाँसी आ गई।
बाहर बैठा वही युवक अपने संवाद याद कर रहा था। वह हर वाक्य में गुर्राता था।
तीसरी बार निर्देशक ने कागज़ नीचे रखवा दिया।
“मान लीजिए किसी ने आपकी सबसे ज़रूरी चीज़ छिपा दी है। आपको मालूम है किसने। अब उससे माँगिए।”
पिता कुछ देर चुप रहे।
फिर बहुत धीरे बोले, “चाबी रख दो। मैं दूसरी बार नहीं कहूँगा।”
अनुष्का सीधी खड़ी हो गई।
वह आवाज़ उसने पहले सुनी थी। बरसों पहले, जब वह बिना बताए स्कूटर लेकर गई थी और लौटकर चाबी फूलदान के पीछे छिपा दी थी।
निर्देशक कुर्सी पर थोड़ा आगे झुका।
“यही। अब भैरव का संवाद इसी तरह।”
इस बार पिता ने कागज़ देखा ही नहीं।
ऑडिशन खत्म हुआ तो कोई तालियाँ नहीं बजीं। निर्देशक ने कहा, “धन्यवाद। चयन हुआ तो संपर्क करेंगे।”
बाहर आकर पिता ने सत्ताईस नंबर की पर्ची उतारी और जेब में रख ली।
“चाय पियोगी?”
“पापा, अंदर वाली आवाज़…”
“अभिनय।”
“आप सच में गुस्सा हो?”
उन्होंने जवाब नहीं दिया।
चाय आने पर अनुष्का ने कहा, “मुझे वो बात नहीं कहनी चाहिए थी। बेटी वाली।”
पिता ने कप की तश्तरी उसकी तरफ सरकाई।
“ठीक है। अगली बार मैं भी नहीं छिपाऊँगा।”
उसी समय स्टूडियो की सहायक बाहर आई।
“सत्ताईस नंबर वाले गए क्या? एक और पात्र पढ़वाना है।”
पिता खड़े हुए।
“कौन-सा?”
“राजा का रसोइया।”
अनुष्का हँस पड़ी।
पिता ने चाय का कप उसे पकड़ा दिया।
“ठंडी मत होने देना,” उन्होंने कहा।
बहुत धीरे।
कहानी के पीछे का खयाल
अनुष्का अपने पिता की आवाज़ घर में सुनती आई है। ऑडिशन में वही आवाज़ उसे नए ढंग से सुनाई देती है। कवर कहानी का AI से बनाया चित्र है।
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