हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
बारिश की छोटी दुकान
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

मीरा ने दुकान के बाहर बोर्ड पढ़ा: पहाड़ की बारिश, छत की बारिश, स्कूल की छुट्टी वाली बारिश। नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था: बोतल वापस करना जरूरी है।
वह सामने वाली सिलाई की दुकान पर काम करती थी। इस गली से रोज गुजरती थी। बारिश की दुकान पहले कभी नहीं देखी थी। अंदर एक बूढ़ी औरत बोतलों पर ढक्कन लगा रही थी। बाहर इतनी गर्मी थी कि मीरा के हाथ में पकड़ा आइसक्रीम का कप पिघल चुका था।
“बारिश बेचते हो?” उसने पूछा। औरत ने खिड़की के पास रखी नीली बोतल खोली। दुकान में टीन की छत पर बूँदें पड़ने की आवाज भर गई। मीरा के गाल पर ठंडी हवा लगी। बोतल बंद हुई तो आवाज भी बंद हो गई।
“कितने की है?” “पैसे नहीं लेती। कोई ऐसी चीज रखो जिसे अब संभाल नहीं पा रही हो।” मीरा ने सोचा। उसके बैग में पुराने घर की चाबी थी। घर बिक चुका था, पर चाबी वह रोज साथ लाती थी।
उसने चाबी काउंटर पर रखी। औरत ने हरी बोतल दी। उस पर कोई नाम नहीं था। “ये कहाँ की बारिश है?” मीरा ने पूछा। “खोलोगी तो पता चलेगा। खिड़की खुली रखना।”
रात को मीरा ने अपने कमरे की खिड़की खोली। बाहर दीवार थी। उसने बोतल का ढक्कन हटाया। गीली मिट्टी की खुशबू आई। फिर एक पीली पत्ती कमरे में आकर गिरी। उसे पत्ती पहचान में आ गई। पुराने घर के आँगन में ऐसा ही पेड़ था।
दीवार की जगह अब वही आँगन दिख रहा था। बीच में नीली बाल्टी थी। उसकी छोटी बहन बारिश में बाल्टी भर रही थी। मीरा ने आवाज दी। बहन ने सिर उठाया, पर मीरा को नहीं देखा। यह पुरानी बारिश थी।
मीरा ने खिड़की से हाथ बाहर किया। बूँदें हथेली पर पड़ीं। पीछे से माँ की आवाज आई, “दोनों अंदर आओ।” वह बहुत देर तक वहीं बैठी रही। फिर ढक्कन लगा दिया। दीवार लौट आई। पत्ती उसके हाथ में रह गई।
अगले दिन उसने बहन को फोन किया। महीनों से बात जल्दी खत्म हो जाती थी। इस बार मीरा ने पूछा, “याद है बाल्टी वाली बारिश?” बहन हँसी। “तुमने कहा था छत पर तालाब बना देंगे।” दोनों देर तक बात करती रहीं।
शाम को वह खाली बोतल लेकर दुकान गई। औरत ने पूछा, “फिर भर दूँ?” मीरा ने चाबी की तरफ देखा। वह एक कटोरे में रखी थी। उसके पास टूटा खिलौना और एक ट्रेन का टिकट था।
“हर बार वही दिखेगा?” “हाँ।” “कुछ बदल नहीं सकता?” “पुरानी बारिश में नहीं।” मीरा ने बोतल नीचे रख दी। उसे फिर वही आँगन देखना था। पर बहन रविवार को उसके कमरे में आने वाली थी। उसे दो कुर्सियाँ खरीदनी थीं।
“अभी नहीं,” उसने कहा। औरत ने चाबी लौटा दी। “इसे रोज लेकर घूमना जरूरी नहीं। रख भी सकती हो।” मीरा ने चाबी ली और पूछा कि दुकान कब खुलती है। औरत ने बस खिड़की की तरफ इशारा किया।
रविवार को बहन आई तो बारिश सच में शुरू हो गई। कमरे की खिड़की से सामने की दीवार ही दिखती थी। दोनों ने कुर्सियाँ खिसकाईं और चाय पी। मेज पर पीली पत्ती रखी थी। इस बार मीरा को बोतल खोलने की जरूरत नहीं पड़ी।
कहानी के पीछे का खयाल
पुरानी बारिश याद को दोबारा दिखा सकती है, बदल नहीं सकती। मीरा के लिए असली बदलाव बहन को फोन करना और नई मुलाकात तय करना है।
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