हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
छत की बारी
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

कमला ने आख़िरी चादर पर मिर्च फैलाकर हाथ झाड़े ही थे कि पीछे से आवाज़ आई, “आज शाम यह जगह खाली चाहिए।”
नई किराएदार ऋतु बाँह में एक लंबी काली नली दबाए खड़ी थी।
“शादी का सामान है?” कमला ने पूछा।
“दूरबीन। बच्चों को चाँद दिखाना है।”
कमला ने चारों चादरों की ओर देखा। पाँच किलो मिर्च थी। दो दिन बाद पिसनी थी।
“चाँद कल भी रहेगा।”
“बच्चे कल नहीं आ सकते।”
“तो मिर्च बच्चों के घर भेज दूँ?”
ऋतु चुप हो गई। उसने दूरबीन पानी की टंकी के पास रखी और नीचे चली गई।
शाम को सात बच्चे सीढ़ियों पर दिखाई दिए। किसी के हाथ में कॉपी थी, किसी के गले में छोटी टॉर्च। ऋतु ने उन्हें टंकी के पीछे खड़ा किया।
वहाँ से चाँद नहीं दिखता था। सामने की इमारत रास्ता रोक रही थी।
कमला कपड़े उतारने आई तो एक बच्चा पंजों पर उचक रहा था।
“कूदने से और साफ़ दिखेगा?” उसने पूछा।
“नहीं,” ऋतु बोली। “आज शायद नहीं देख पाएँगे।”
कमला को उसका जवाब अच्छा नहीं लगा। शिकायत करती तो बहस आसान रहती।
उसने एक चादर का कोना उठाया। मिर्च बीच में खिसक गईं।
“यहाँ रख लो।”
ऋतु ने दूरबीन जमाई। पहला बच्चा झुका, फिर अचानक पीछे हट गया।
“इसमें तो गड्ढे हैं!”
बाकी बच्चे अपनी बारी भूलकर आगे बढ़े। कमला ने हाथ फैलाकर उन्हें रोका।
“मिर्च पर पैर रखा तो चाँद पैदल जाकर देखना।”
एक-एक करके सबने देखा। आख़िर में ऋतु ने दूरबीन कमला की तरफ़ घुमा दी।
“आप भी।”
कमला ने आँख लगाई। गोल चाँद एक किनारे से कटा हुआ था। सफ़ेद हिस्से पर ऊबड़-खाबड़ निशान इतने पास दिख रहे थे कि उसने अनायास नली से हाथ हटा लिया।
“गिर तो नहीं जाएगा?”
बच्चे हँसे। कमला भी हँस पड़ी।
अगले रविवार ऋतु फिर आई। इस बार कमला ने मिर्च की जगह पापड़ फैला रखे थे।
दोनों एक-दूसरे को देखने लगीं।
“हर बार मुझे समेटना पड़ेगा?” कमला ने पूछा।
“नहीं। पहले समय तय कर लेते हैं।”
उन्होंने पानी की टंकी पर चॉक से लिखा: रविवार, शाम सात से आठ, दूरबीन। नीचे कमला ने जोड़ दिया: बाकी समय भी पूछकर आएँ।
ऋतु ने सिर हिलाया।
उस शाम बच्चे आए तो पापड़ एक तरफ़ थे और दूरबीन दूसरी तरफ़। बीच में आने-जाने की साफ़ जगह छोड़ी गई थी।
कमला एक बच्ची को चाँद देखने का तरीका समझा रही थी।
“एक आँख बंद। नली को धक्का नहीं देना।”
ऋतु मुस्कराई। “अब आप सिखाएँगी?”
“तुम बच्चों की बारी लिखो,” कमला बोली। “मुझे अभी शनि देखना है।”
कहानी के पीछे का खयाल
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