हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
दो अलग रास्ते
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

स्कूल के नाटक की टिकट बुक करते समय अविनाश ने फोन पर बीच वाली दो सीटें चुनीं। फिर एक हटा दी।
तलाक के बाद पहली बार वह और प्राची किसी कार्यक्रम में साथ आने वाले थे। साथ, यानी एक ही समय पर। आठ महीने से इस शब्द का यही अर्थ बचा था।
उसने प्राची को संदेश लिखा: मेरी सीट सी-आठ है। तुम्हारी?
उत्तर आया: ए-एक। निकलने में आसानी रहेगी।
अविनाश ने फोन जेब में रख लिया।
पर्दा खुलने से पहले उनका बेटा अंश दोनों को ढूँढ़ता हुआ आया। उसके चेहरे पर पेड़ का भूरा रंग लगा था और सिर से कागज़ की पत्तियाँ निकल रही थीं।
“इतनी दूर क्यों बैठे हो?”
“यहाँ से अच्छा दिखेगा,” अविनाश ने कहा।
अंश ने पहले खाली कुर्सी देखी, फिर माँ की ओर।
“मैं तुम्हारे पास बैठ जाऊँ?” प्राची ने अविनाश से पूछा।
अंश ने कुछ सोचा। “नहीं। मेरा चेहरा पहले इधर होगा, फिर उधर। दोनों तरफ से देखना।”
नाटक में उसका केवल एक संवाद था: “इस पेड़ को मत काटो।”
लेकिन उसकी बारी आई तो सामने खड़े बच्चे ने अगली पंक्ति बोल दी। अंश चुप रह गया। कागज़ की पत्तियाँ हिल रही थीं।
अविनाश कुर्सी के किनारे आ गया। पहली पंक्ति में प्राची ने दोनों हथेलियाँ घुटनों पर दबा लीं।
फिर अंश ने दूसरे बच्चे के कंधे पर हाथ रखा।
“पहले मेरी बात सुनो। इस पेड़ को मत काटो।”
सभागार हँस पड़ा। अगला संवाद इस बार सही समय पर आया।
बाहर प्राची ने पूछा, “आइसक्रीम?”
“आज पापा के साथ जाना है,” अंश बोला। “तुम कल पूछना, मैंने कैसा किया।”
“मैंने देखा तो है।”
“फिर भी पूछना।”
प्राची हँसी। उसने बेटे के बालों से हरी टेप उतारी और अविनाश को दे दी।
पार्किंग में दोनों गाड़ियाँ अलग दिशाओं में मुड़ीं। पीछे की सीट पर अंश अपना संवाद फिर बोल रहा था, इस बार बिना किसी जल्दी के।
कहानी के पीछे का खयाल
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