हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
मशीन किसकी है?
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

सुमन ने कबाड़ी को मशीन की तस्वीर भेज दी थी। वह रविवार को आने वाला था।
शनिवार की दोपहर छोटी बहन वंदना पहुँची तो बैठक के बीचोंबीच सिलाई मशीन रखी थी। उसके नीचे पुराने अखबार बिछे थे। तेल की छोटी शीशी, दो खाली बॉबिन और जंग लगी कैंची अलग डिब्बे में पड़ी थीं।
“इसे भी बेच रही हो?”
“चलती नहीं है। ठीक करवाओ तो जगह चाहिए। रखो तो सफाई।”
“माँ की आख़िरी निशानी है।”
सुमन ने सामने की दीवार देखी। उस पर माँ की तस्वीर थी। अलमारी में उनकी साड़ियाँ थीं। रसोई में मसाले के डिब्बों पर अब भी उन्हीं की लिखावट थी।
“तू ले जा।”
वंदना चुप हो गई।
उसके फ्लैट में पहले ही बच्चों की साइकिलें खाने की मेज़ के नीचे रखी रहती थीं। पिछली बार माँ की बड़ी संदूक ले जाने की बात हुई थी तो उसने दरवाज़े की चौड़ाई नापकर बताया था कि अंदर नहीं आएगी।
“वहाँ जगह नहीं है,” उसने धीरे से कहा।
“यहाँ जगह अपने आप बन जाती है?”
बात वहीं रुक गई। दोनों जानती थीं कि मशीन से शुरू हुआ झगड़ा कहाँ तक जा सकता है।
माँ की बीमारी में सुमन इसी घर में रही थी। दवाइयाँ, कपड़े, रात की घंटी। वंदना दूसरे शहर से पैसे भेजती थी और हर बातचीत के आखिर में कहती थी, “अपना ध्यान रखना।”
आज भी वह यही कहने लगी, फिर रुक गई।
बरामदे में बैठे पिता ने अखबार मोड़ा।
“कितना दे रहा है?”
“आठ सौ,” सुमन बोली।
“इतने में?”
“बाबूजी, उसका वजन खरीद रहा है। माँ की याद नहीं।”
पिता उठकर मशीन के पास आए। पहिया घुमाया। सुई आधी नीचे आई और अटक गई।
“धागा फँसा है।”
“ठीक करवानी है तो करवा देते हैं,” वंदना ने तुरंत कहा।
सुमन ने उसकी तरफ देखा।
“फिर?”
इस बार जवाब पिता ने दिया।
“फिर मैं चलाऊँगा।”
दोनों बहनें हँस दीं। पिता नहीं हँसे।
उन्होंने कुर्सी के पीछे टँगा पाजामा उठाया। एक पाँयचा दूसरे से छोटा था। मोड़ के पास बड़े-बड़े टाँके लगे थे।
“कल हाथ से किया। सीधा नहीं हुआ।”
सुमन ने पाजामा लिया। “मुझसे कह देते।”
“तुमसे हर चीज़ क्यों कहूँ?”
कमरे में कुछ देर मशीन के पहिए की हल्की आवाज़ रही।
पिता ने बताया कि माँ के रहते वे इसमें तेल डालते थे, बेल्ट चढ़ाते थे, कभी-कभी नीचे फँसे धागे निकालते थे। सिलना कभी नहीं सीखा। ज़रूरत ही नहीं पड़ी थी।
वंदना ने डिब्बे से कैंची उठाई।
“चलाना कौन सिखाएगा?”
“गली में जो दुकान है, उससे पूछूँगा।”
रविवार को कबाड़ी आया तो मशीन बैठक में नहीं थी। पिता ने उसे बरामदे के उजाले वाले कोने में रखवा लिया था।
सुमन ने उससे अखबार तुलवा दिए।
दोपहर तक पिता ने पुराने तकिए के कपड़े पर चार टेढ़ी लाइनें सिल लीं। पाँचवीं में धागा टूट गया। उन्होंने चश्मा उतारकर सुई के पास आँख लगाई।
वंदना मदद करने उठी तो सुमन ने उसका हाथ रोक लिया।
“पहले कोशिश करने दे।”
अगले रविवार वंदना के फोन पर एक तस्वीर आई। मशीन के ऊपर नया कपड़े का कवर था। एक तरफ का कोना छोटा पड़ गया था और ऊपर लाल धागे से नाम टाँका गया था।
रमेश।
नीचे सुमन का संदेश था: “बाबूजी कह रहे हैं, अगला इससे अच्छा बनेगा।”
कहानी के पीछे का खयाल
सिलाई मशीन के बहाने परिवार में काम और जिम्मेदारी की बात खुलती है। कवर कहानी का AI से बनाया चित्र है।
मेरी पसंद की कहानियाँ (0)
इसी browser में सेव हैं। Browser का डेटा साफ करने पर हट जाएँगी।
अभी कोई कहानी सेव नहीं है। कहानी खोलकर सेव करें।