हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
मूँछ के नीचे की गाँठ
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छत पर पतंग बनाना सिखाने के लिए श्रीवास्तवजी ने अपनी सबसे बड़ी पतंग निकाली। उस पर उनका चेहरा बना था: काली मूँछ, सुनहरे चश्मे और हल्की नीली कमीज़ वाला। तस्वीर मोहल्ले के साइनबोर्ड बनाने वाले ने बनाई थी। मेहनताना देकर लौटते समय श्रीवास्तवजी उसे सीट पर रखने के बजाय गोद में लेकर आए थे।
रुचि ने पतंग उठाकर बीच की बाँस की तीली जाँची।
“कन्ने कहाँ बाँधेंगे?”
“किनारे पर। चेहरे को छोड़ देना।”
रुचि ने धागा किनारों पर बाँधा। नीचे खड़े बच्चों ने रास्ता खाली किया। पतंग उठी, आधा चक्कर काटा और पानी की टंकी से जा लगी।
“हवा ठीक नहीं है,” श्रीवास्तवजी ने कहा।
उसी समय पड़ोस की छत से एक छोटी हरी पतंग उनके सिर के ऊपर निकल गई।
रुचि पतंग वापस लाई। उसने पेंसिल से दो जगह निशान लगाए। एक माथे पर था, दूसरा मूँछ के ठीक नीचे।
“यहाँ छेद करने पड़ेंगे।”
श्रीवास्तवजी ने पतंग अपनी तरफ खींच ली।
“मूँछ पर?”
“नीचे। मूँछ बच जाएगी।”
बच्चे चुपचाप देख रहे थे। सबसे छोटा बच्चा अपनी पतंग और सुई लेकर पहले ही कतार में लग गया था।
श्रीवास्तवजी ने चश्मा उतारा, निशान को पास से देखा और पतंग लौटा दी।
“सुई पतली वाली लेना।”
नई गाँठ बाँधते समय रुचि ने धागे की लंबाई दो बार बदली। इस बार पतंग सीधी उठी। उसने डोर ढीली की और फिर हल्का खिंचाव दिया। सुनहरे चश्मे वाला चेहरा टंकी के ऊपर पहुँचा, फिर सामने के मकान से भी ऊँचा।
श्रीवास्तवजी के हाथ चरखी सँभालते हुए खुल गए। नीचे से किसी ने उनकी तस्वीर ली।
“एक ऊपर वाली की भी लो,” उन्होंने कहा।
शाम को रुचि ने दोनों तस्वीरें भेजीं। पहली में श्रीवास्तवजी मूँछ में छेद होते देख रहे थे। दूसरी में पतंग खुले आसमान में थी।
उनका जवाब तुरंत आया।
“दूसरी भेजना मोहल्ले के ग्रुप में। पहली तुम्हारे पास रहे।”
कहानी के पीछे का खयाल
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