हिंदी कहानी — मौलिक काल्पनिक कहानी
वापस आई किताब
यह scroll के हिसाब से अंदाजा है, पढ़े हुए शब्दों की गिनती नहीं।

तीसरी बार वही किताब लौटाने पर इला ने उसे काउंटर पर खोल लिया।
“इस बार क्या खराबी है?”
ग्राहक ने झोले का फीता कंधे पर ठीक किया। “अंत।”
“पिछली बार भी अंत ही था।”
“इस बार ध्यान से पढ़ा।”
पुरानी किताबों की दुकान पर इला आधी कीमत देकर किताबें वापस लेती थी। यह आदमी तीन हफ्तों में एक ही उपन्यास तीन बार खरीद चुका था। पिछली दोनों बार लौटाते समय उसे पचास रुपये का नुकसान हुआ था।
“कातिल बदल तो नहीं गया होगा?” उसने पूछा।
“प्रेम कहानी है।”
इला ने आखिरी पन्ना देखा। नीली स्याही से दो पंक्तियाँ काटी गई थीं। नीचे छोटे अक्षरों में एक नया वाक्य लिखा था।
“आपने इसमें लिखा है?”
“जहाँ ज़रूरी था।”
“ज़रूरी हो तब भी अपनी किताब में लिखिए।”
“खरीदी तो मैंने थी।”
“फिर वापस मत कीजिए।”
वह चुप हो गया।
इला ने किताब पलटी। शुरू के पन्नों पर भी निशान थे। कहीं कोई विशेषण काटा गया था, कहीं पूरे संवाद के आगे सवाल का निशान था। एक जगह लिखा था: यह आदमी इतना बोल क्यों रहा है?
“आप अध्यापक हैं?”
“नहीं।”
“समीक्षक?”
“बच गया।”
इला को हँसी आ गई। उसने शीर्षक पन्ना खोला। लेखक का नाम था अरुण अज्ञात। पीछे धुँधली तस्वीर में एक युवक गर्दन तिरछी करके बैठा था।
उसने ग्राहक को देखा।
“आप?”
“तब चश्मा नहीं लगता था।”
“नाम अज्ञात क्यों रखा?”
“लगा था लोग खोजेंगे।”
बाहर एक साइकिल वाला घंटी बजाता हुआ निकला। दुकान में कुछ देर तक सिर्फ पंखे की चरमराहट रही।
उपन्यास पैंतीस साल पहले छपा था। इला के पास उसकी चार प्रतियाँ थीं। एक पुराने गोदाम की किताबों के साथ आई थीं।
“बाकी तीन भी दिखाइए,” उन्होंने कहा।
इला ने शेल्फ़ से निकालीं।
उन्होंने पहली खोली, फिर दूसरी। तीसरी के आखिरी पन्ने पर उँगली रोक दी।
“चारों में वही गलती है।”
“छपाई की?”
“लड़की को नौकरी मिलती है। दूसरे शहर में। लड़का स्टेशन पर रोक लेता है और वह उतर जाती है।”
“तो?”
“उसने परीक्षा दी। तैयारी की। नौकरी उसे मिली। आखिरी दो पन्नों में फैसला लड़का कर देता है।”
इला ने कुर्सी आगे खिसका दी।
“अब क्या करेंगे?”
“सोच रहा था, अगली बार वह ट्रेन से न उतरे।”
“इन प्रतियों में?”
उन्होंने झोले से पेन निकाला, फिर वापस रख लिया।
इला ने पहली किताब उनकी ओर सरका दी। “इसे रख लीजिए। अब इसके पन्नों की हालत देखकर कोई और नहीं खरीदेगा।”
उन्होंने पैसे देने चाहे।
“इसके पैसे आप पहले दे चुके हैं।”
वह जाने लगे तो दरवाज़े पर रुके।
“खाली कॉपी है?”
इला ने नीचे की दराज़ से निकाली।
उन्होंने पहला पन्ना खोला। कुछ देर पेन थामे रहे, फिर लिखा:
गाड़ी चली तो उसने खिड़की से हाथ हटाकर अपनी सीट ढूँढ़ी।
“यहीं से शुरू करेंगे?” इला ने पूछा।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “पहले देखूँगा, वह पहुँची कहाँ।”
कहानी के पीछे का खयाल
पुराने उपन्यास का अंत बदलने की कोशिश से इला और लेखक के बीच यह बातचीत शुरू होती है। कवर कहानी का AI से बनाया चित्र है।
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